मायापुर नवद्वीप धाम

नवद्वीप  धाम (मायापुर)Navdvip Dham(Mayapur)

 

 मायापुर   नवद्वीप धाम में ही एक नदी द्वीप है। नवद्वीप धाम नव नदी  द्वीप के लिए प्रसिद्ध है जिसमें एक नदी द्वीप मायापुर हैं। यह पश्चिम बंगाल के नदिया जिला में स्थित है। दोस्तों यहां प्रश्न यह उठता है, कि पूरी विश्व मे मायापुर क्यों विख्यात है ।आज से करीब 500 साल पूर्व चैतन्य महाप्रभु का जन्म  18 फरवरी 1484 ईसवी में नवद्वीप धाम में हुआ था। वैदिक शास्त्र के अनुसार महाप्रभु भगवान श्री कृष्ण के अवतार थे ।कलयुग में लोग वैदिक ज्ञान को भूलते जा रहे हैं। वैदिक ज्ञान जीव आत्मा को भगवान से जोड़ने का काम करता है ,आज अधिकांश लोग भूल रहे हैं या भूल चुके हैं, कि सारी जीवात्मा भगवान कृष्ण के अंश हैं। इस ज्ञान को बताने के लिए और कृष्ण प्रेम प्रदान करने के लिए भगवान कलयुग में अवतार लिए थे। भगवान चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्तजन इसी नवद्वीप धाम में कृष्ण भक्ति का प्रचार -प्रसार किये थे। तब से लेकर आज  इस नवदीप धाम में उनके शिष्य और भक्तों द्वारा कृष्ण प्रेम और उनके द्वारा बताई गई दिव्य ज्ञान का प्रचार हो रहा है। आज उनके भक्तों द्वारा नवदीप धाम मायापुर में विश्व के सबसे बड़ा मंदिर इस्कॉन टेंपल (कृष्ण मंदिर) का निर्माण किया गया है। भगवान इस नवदीप धाम के गली गली में जाकर संकीर्तन द्वारा कृष्ण भक्ति का प्रचार करते थे। भगवान चैतन्य महाप्रभु और भक्तजन का एक ही उद्देश्य था, कि लोगों को कृष्ण प्रेम प्रदान करना। आज पूरे विश्व में उनके भक्त श्रीला प्रभुपाद जी के द्वारा कृष्ण भक्ति का प्रचार प्रसार किया गया है, और  उनके शिष्य द्वारा किया जा रहा है।

 

नवदीप धाम मुख्यतः चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं और मायापुर इस्कॉन टेंपल के लिए जाना जाता है। नवदीप धाम भगवान का धाम है। यहां भगवान की लीलाओं का वर्णन किया गया है। यहां गली गली में हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामंत्र से भगवान के नामों का जप किया जाता है। इतना ही नहीं इस महामंत्र के द्वारा मिरदंग ,करताल और बाजा के साथ संकीर्तन किया जाता है। यहां गली-गली में भगवान के नामों का जय जय कार होता है 

 

श्री नवद्वीप मंडल परिक्रमा(Sri Navdvip Mandal Prikrma)

इस धाम की महिमा पूरे देश विदेश में फैला हुआ है। इस धाम की महिमा को देखते हुए यहां साल में एक बार श्री नवदीप मंडल परिक्रमा का आयोजन किया जाता है। इस परिक्रमा के दौरान भगवान चैतन्य महाप्रभु जहां -जहां अपने जीवन काल में रहे हैं, खेले हैं, और समय बिताएं हैं उस -उस जगह का दर्शन और दंडवत प्रणाम किया जाता है। यहां आज भी महाप्रभु से संबंधित स्थान, मंदिर और अन्य वस्तुओं सुरक्षित रखा गया है। इनके दर्शन के लिए पूरे विश्व से भक्तजन आते हैं और परिक्रमा में भाग लेते हैं। श्री नवद्वीप मंडल परिक्रमा फरवरी मार्च के महीना में 7 दिनों के लिए आयोजन किया जाता है। इस नवदीप परिक्रमा में इतनी भीड़ हो जाती है। कि भक्तों को कई समूहों में बांट दिया जाता है। प्रत्येक समूह अपनी यात्रा प्रारंभ करते हैं। वहां के भक्तों द्वारा रात में ठहरने की व्यवस्था काफी अच्छी तरह की जाती है। इस 7 दिन की यात्रा में 9 दीपों की परिक्रमा की जाती है। यह 9 द्वीपों इस प्रकार हैं  कुल द्वीप, रूद्रदीप, सीमांत द्वीप, अंतर द्वीप, गोदम द्वीप ,मध्य द्वीप, रितु द्वीप, जन्हु द्वीप और मायापुर द्वीप। यह सभी नदी द्वीप हैं। ये नदी के किनारे स्थित होने के कारण काफी हरा भरा और पेड़ पौधे से युक्त हैं। इस सभी द्वीप का दृश्य सुंदर और सुहावन है। ऐसा माना जाता है, कि श्री नवदीप मंडल परिक्रमा में भाग लेकर 9 द्वीपों के परिक्रमा करने पर जो फल मिलता है। वह हजारों लाखों यज्ञ के बराबर होता है।

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श्रीला प्रभुपाद जी के कुशल मार्गदर्शन में और कृष्ण भक्तों के द्वारा  मायापुर में विश्व के सबसे बड़ा इस्कॉन मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। यह मंदिर गंगा नदी के किनारे स्थित है। इस मंदिर के अंदर भगवान श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु की पूजा अर्चना विग्रह की स्थापना की गई है। पूरे विश्व से कृष्ण भक्त भगवान के दर्शन के लिए यहां आते हैं। इस्कॉन मंदिर परिसर में प्रभुपाद जी के कुटिया है। जहां प्रभुपाद जी रहते थे। भगवान के सेवा करते थे, इनकी समाधि स्थल भी इसी मंदिर परिसर में है। ,जैसा कि आप सब जानते हैं, प्रभुपाद जी जगतगुरु हैं उन्होंने पूरे विश्व में कृष्ण भक्ति का प्रचार किया और लोगों को अपना शिष्य बनाया। अपने शिष्यों को कृष्ण प्रेम प्रदान किए।मंदिर निर्माण का मुख्य कारण प्रभुपाद जी की परम इच्छा थी, कि विश्व के विभिन्न देशों से लोग यहां आए और भगवान की लीलाओं के बारे में जानें और उनकी दर्शन करें।

 

चैतन्य महाप्रभु(Chaitanya Mahapraphu)

 

चैतन्य महाप्रभु साक्षात भगवान श्री कृष्ण है। कलयुग में भगवान का जन्म राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक कलह  और ऊंच-नीच भेद भाव को दूर करने के लिए जन्म हुआ था। उनका जन्म 14 फरवरी 1486 ईस्वी में पश्चिम बंगाल के नदिया जिला में हुआ था। नदिया के अब नव द्वीप के नाम से जाना जाता है। इनका बचपन का नाम निमाई था। उनके माता का नाम सची देवी और पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र था। निमाई एक बड़ा भाई थे। जिनका नाम विश्वरूप था। विश्वरूप अपने 17 वर्ष के उम्र में सन्यास ग्रहण कर के घर से चले गए थे। केवल निमाई ही अपने माता-पिता के एकमात्र सहारा थे। वह अपनी मां को बहुत मान करते थे। उनके बाल अवस्था के दर्शन के लिए बहुत सारे देवी देवता विभिन्न रूप धारण करके आते थे। 

 

एक दिन सच्ची माता और जगन्नाथ मिश्र ने अपनी नीमाई के भविष्य के बारे में जानने के लिए उनके सामने चाकू, भागवत गीता, रुपया पैसा, मिठाई आदि चीजें रखती है  ऐसा पहले का संस्कार था। बोले नीमाई बेटा जो अच्छा लग रहा है उसे उठा लो निमाई ने झटपट भागवत गीता उठा लिया। माता-पिता समझ गए कि आगे चलकर निमाई भगवान के बड़ा भक्त बनेगा।

 

 जब एक दिन  निमाई रोने लगे तो काफी प्रयास करने के बाद सच्ची माता उन्हें चुप नहीं करा सकी। अंत में सच्ची माता भगवान के नाम हरि बोल हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे  कीर्तन करने लगी, तो चुप हो गए। वृंदावन दास ठाकुर अपने चैतन्य भागवत पुस्तक में कहते हैं, निमाई पंडित भगवान के अवतार नहीं है, वह तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण है, जो इस कलयुग में लोगों को कृष्ण प्रेम प्रदान करने के लिए आए हैं।



 निमाई पंडित एक दिन अपनी बाल वस्था में घर के आंगन में खेल रहे थे। तभी एक काला नाग आया उनके आगे फन फैलाकर  कुंडली मारकर देखने लगा, निमाई बड़े आराम से कुंडली पर बैठ गए, अपने हाथ रख कर खेलने लगे यह देख सच्ची माता चिल्लाई निमाई !  यह सुनकर नाग चला गया। सची माता समझ गई कि निमाई के अंदर कोई असाधारण आत्मा है।फिर भी सची माता अपने पुत्र के मोह ममता में इतने लीन थे। की इस  घटना को देवी - देवता के चमत्कार मानते थे। वह कभी नहीं माने की मेरा बेटा साक्षात भगवान है।

 

 कुछ समय बाद जगन्नाथ मिश्र  को अचानक बुखार लगी , और अपना शरीर छोड़कर चले गए। अब सच्ची माता के लिए निमाई ही एकमात्र सहारा थे। मां की ममता और बढ़ती गई। जब उनकी उम्र लगभग  सत्रह साल हो गई ,तो माता के आग्रह पर वे वल्लभाचार्य के पुत्री लक्ष्मी देवी से विवाह कर लिए। निमाई पंडित बहुत कम उम्र में लगभग 11 वर्ष में वैदिक शास्त्रों का गहन अध्ययन कर चुके थे। वह इस दिनों बच्चों को व्याकरण पढ़ाते थे। इस तरह समय बितते गया। एक दिन लक्ष्मी देवी को मामूली से बुखार लगी और अपनी शरीर छोड़ कर चल बसी। इसे देख सची माता बहुत दुखी हूं। अब शची माता नीमाई सहारे जी रहे थे। इस तरह दो वर्ष बीत गए। माता की आज्ञा  और निवेदन पर महाप्रभु पंडित सनातन मिश्र की कन्या विष्णु प्रिया से विवाह कर लिया। सुने घर में फिर से चहल-पहल हो गई। विष्णु प्रिया के अच्छे स्वभाव धीरे-धीरे शचि माता और निमाई, लक्ष्मी देवी के विछोह का दुख भूल- सा गए। अब सब कुछ ठीक चलने लगा। इस तरह कुछ वर्ष बीत गए। जब वे 24 वर्ष के हो गए हैं, तो उन्होंने अपनी माता और पत्नी की आज्ञा लेकर सन्यास लेने का निर्णय कर लिया। कुछ दिन बाद आज्ञा लेने के लिए अपनी माता के पास गए। यह सुनते ही माता सोक में पड़ गई। माना करते हुए रोने लगी। महाप्रभु अपनी मधुर वाणी से माता को समझा कर चुप करा दिए। जब रात हुई तो माता और पत्नी सोते हुए छोड़कर सन्यास के लिए घर से निकल गए। घर से निकलकर वह केशव भारती की कुटिया पर पहुंचे, और उनसे दीक्षा ग्रहण कर लिया। तब उनका नाम चैतन्य प्रभु हो गया। अब वह कृष्ण भक्ति में लीन हो गए। कुछ वर्षों तक उन्होंने नव द्वीप धाम में ही कृष्ण भक्ति का प्रचार किए। और शेष समय उन्होंने वृंदावन और जगन्नाथपुरी में बिताए।



हरे कृष्ण

बलवंत कुमार




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